रविवार, 30 अप्रैल 2017

पृथ्वी को छोड़कर दूसरे ग्रह पर शिफ्ट होने की जद्दोजहद के बीच हम

इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में जब पूरी दुनिया एक टेबल पर बैठकर डिनर कर रही है , तब समस्याएँ ग्लोबल हो रही हैं। आज पूरी दुनिया की दूरियाँ समाप्त हो गई हैं। हम सब एक क्लिक की दुनिया पर आकर रुके हैं।
इतनी बड़ी दुनिया का इतना छोटा आकार देने में आईटी प्रोफेशनल्स का बहुत बड़ा योगदान हैं । हमारी सोच दूरदर्शी हो रही हैं। हम वर्तमान से अधिक भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। इस दुनिया का वर्तमान उस  सड़े हुए अंडे के समान है, जिसे तोड़ने के बाद कुछ निकलना शेष नहीं रहता।
हमारे सुधि वैज्ञानिक इस दुनिया के भविष्य को  लेकर इसके वर्तमान से अधिक चिंतित है। हमने परमाणु बम, हाइड्रोजन बम ,बैलेस्टिक मिसाइल, एयरक्राफ्ट विमान और तमाम विनाशक हथियारों का जखीरा ईजाद कर लिया हैं । जो अभी विकास की प्रकाष्ठा तो नहीं लेकिन निकट भविष्य में विकास की पराकाष्ठा तक पहुँच जाएँगे। तब छद्म युद्ध या युद्ध महीनों और घंटो में नहीं , मिनटों में लड़ा जाएगा, और बर्बादी का आँकलन लाशें गिन कर नहीं ,सेटेलाइट से  किया जाएगा।
हमने इस दुनिया को जितना ही अपने अनुकूल बनाया यह दुनिया हम से उतना ही प्रतिकूल होती गई। बड़े-बड़े अविष्कार, मानव समुदाय के लिए वरदान तो साबित हुए। लेकिन अपराधिक तत्वों के लिए भी हथियार बने। जब जब मानव  सभ्यता विकास की पराकाष्ठा पर पहुँचा है, तब-तब मानव सभ्यता का दुखद अंत हुआ है।
अब हम उस क्षण के निकट पहुँच गए हैं। जब आने वाले दिनों में हमें, इस दुनिया को छोड़ कर किसी दूसरे ग्रह पर शिफ्ट होना होगा। यह धरती हमारे रहने लायक नहीं रह जाएँगी। प्राकृतिक आपदा बढ़ जाएँगे, समुंद्र हमारे घरों की रूख करेंगे, रह-रहकर धरती काँपेगी , बड़े-बड़े टावर , सड़कें और इमारतें धराशायी होंगे ।
पृथ्वी से  जैव परिस्थितिकी का अंत हो जाएगा । जैव परिस्थितिकी का सबसे चतुर और विनाशक प्राणी, मनुष्य के होने के नाते। इस विनाशकारी क्षण से निपटने की तैयारी भी मनुष्य  मस्तिष्क में कौंधने  लगा है ।
मनुष्य पृथ्वी से सुदूर किसी दूसरे ग्रह पर शिफ्ट होने के बारे में अब अध्ययन और अनुसंधान शुरू कर दिया है।
आने वाले दिनों में पृथ्वी से सुदूर ग्लोबल कॉलोनी विकसित होंगी। जहाँ पृथ्वी के सारे मनुष्यों को राकेट यान से प्रक्षेपित करना होगा। यह एक जटिल और लंबी प्रक्रिया होगी। जिससे मनुष्य समुदाय को जूझना होगा। मनुष्य विवेकशील प्राणी है और विवेकशील होने के नाते, राजनीतिक , दबदबा और प्रभावशाली लोगों के बीच प्रक्षेपित होने, न होने की होड लगेगी। फिर ऐसी स्थिति में भेद-भाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। तमाम आशंकाओं के बीच यह क्षण बड़ा ही दुखद होगा।
पृथ्वी लोक से मनुष्य की विदाई कितना भयावह होगी। जब मनुष्य की स्मृतियाँ,  विरासत , द्वेष ,विजय - पराजय ,मंदिर- मस्जिद, गुरुद्वारे- चर्च, राजनीतिक स्लोगन, झंडे , प्रतिद्वंदिता, वाद -विचारधारा और धर्म- अर्धम  सब कुछ को अलविदा कह, मनुष्य को खुशी और गम के साथ , एक नए ग्रह पर प्रक्षेपित होना होगा। जहाँ साथ लेकर जाने के लिए केवल मनुष्य होगा। उसकी उपयोगी तकनीक, हथियार , मशीनें,  करेंसी और बहुमूल्य संपदाएँ , याद बनकर रह जाएँगे क्योंकि उन्हें वह चाहकर भी वहाँ नहीं ले जा पायेगा । उस ग्रह पर ग्लोबल कॉलोनियों की अपनी कुछ विशेषताएँ होंगी। जिसके अनुरूप मनुष्य को ढलना होगा........

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

आप से आप तक

मैं एक पखवाड़े से बहुत व्यस्त हूँ , स्वच्छ भारत अभियान से । मेरे बेडरूम में दो पखवाड़े से झाड़ू भी नहीं लगा। मेरी व्यस्तता  आप समझ सकते हैं ।अब तो मैं झाड़ू नाम से डरने लगा हूँ। मेरे भय का कारण झाडू से पिटाई नहीं , आप हैं । आप का जन्म ही अन्ना जैसे  बाल ब्रम्हचारी , फौजी के अनचाहे पुत्र के रूप में, इस वादे के साथ हुआ कि हम सियासत की गंदगी को धोएँंगे। लेकिन धोने की बजाय ये इसे निगल लिए । अब तो यही गंदगी में तब्दील हो गए हैं ।
मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान से तिलमिलाएँ आपके सेवकों ने जंग से जंग का एलान कर दिया । झाड़ू के साथ दिल्ली की सड़कों पर उतर आएँ । झाड़ू से इतना धुल उडाया कि दिल्ली की सारी धुल हवा में मिल
 गई।
अरविंद भाई तो मफलर घसका कर 'नाक' पर कर लिए हैं ताकि 'नाक' भी बच जाए और जान भी। पर बिना मफलर वाले हाफँ रहे हैं । इस हाफँ का तेवर जंग साहब ने भी महसूस किया और अविलंब आपात बैठक बुला ली। बैठक का नतीजा आना अभी बाकी हैं ।
वह भी आप की तरह जानलेवा ही होगा ।
दिल्ली में आप ने बहुत तब्दीलियाँ लाई । यहाँ तक कि गाली देने का लहजा भी बदल दिया । अब दिल्लीवासियों को गाली देनी होती हैं तो कहते हैं, फलाँ की माँ आप वालों से राशन कार्ड  बनवायी हैं ....
                         🔥पुष्प

शनिवार, 19 नवंबर 2016

कोयल

धरती  घेरे ,
जल  घेरे ,
खड़ी कर ली दीवार 
अब तो 
नील गगन घेरने को तैयार।
 जिससे न हो
 विषैली हवाएँ आरपार ।
तिनकों के घोसले में 
डिप्रेश हो बैठी चिड़िया 
अब तो उसके लिए 
न दिल्ली रहा न रहा पंजाब
 मिट्टी दूषित 
जल दूषित 
दूषित कर ली आकाश 
गिन रहे हैं हम अब 
अपनी सांसे।
 अब  हवा का हो व्यापार।
 खेतों में जब कूके कोयल,
 बांछे खिल जाती हैं।
 किसानों के कानों में
 मधुर गाने गुनगुनाती हैं।
 दिल्ली में जब कूकती  कोयल,
 ध्वनि प्रदूषण बढ़ जाती हैं।
 महामहिम के बंगलों पर
 पिंजरे में वो गाती हैं।
 मैली होती दुनिया देख कर 
 सत्ता पक्ष ढूंढ रहे,
 दूसरे ग्रहों पर संसार।
 कोयल के कूकने से,
 बाधित हैं सरकारी कार्य ।
 दिल्ली पुलिस तैयार बैठी हैं ,
 बिना वारंट के ही 
 कर लेगी कोयल को गिरफ्तार।
 चाक-चौबंद हैं
 सुरक्षा के इंतजाम।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

दुश्मन

दुश्मन छिप-छिपकर ,
करते हैं ।
भारत के दिलों पर प्रहार।
 फेकते हैं जुल्म का गोला ,
मानवता पर करते प्रहार।
 मासूम निर्दोषों को
 बनाते हैं शिकार ।
ये गीदड़ नोच रहे हैं
 मानवता का मांस
देख रहे हैं सब
 देख रहा पूरा संसार
चुप हैं ऐसे जैसे
सब हो अंधापन के शिकार।
 क्या विश्व में ?
मानवता को बचाने की
 इच्छा  विनष्ट हो गई है आज।
 ऐसा नहीं कि
 भारत दुष्टों से डरा हुआ है।
 ऐसा नहीं कि
 भारत उन सबों से नहीं लड़ा हुआ है।
 भारतीयों के पराक्रम को
 देख चुका है संसार।
 शांति का गीत  गाकर
भेजते आतंकियों का उपहार।

श्रद्धांजलि

शहीदों के स्मृति में ...

शत शत नमन करते भारतवासी,
तुझे श्रद्धांजलि देते 
गगन के तारागण ।
तुझे असंख्य पुष्प 
अर्पित करता पुष्पकाल,
झुम - झुम कर गाता 
पवन का झोका ,
तेरी वीर गाथा ।
नदियाँ तेरी वीरता पर इठलाये,
हिमालय अपना 
मस्तक ऊँचा कर मुँस्काए,
सूर्य चन्द्रमा की किरणें, 
तुझे श्रद्धांजलि हैं लाये,
वनस्पति जगत तेरी वीरता, 
जन - जन तक पहुँचाये।
हे भारत के अमर शहीद, 
तेरी वीरता का गाथा
 भारत के कण कण में
 हैं समाये।
भारत का जन जन
तेरी श्रद्धांजलि का गीत गाए।
मैं क्या दूँ  
श्रद्धांजलि में तुझे अर्पण,
किन शब्दों में करूँ 
मैं तेरा वन्दन अभिनन्दन,
अंतिम बार स्वीकार करो
मेरा प्रणाम! 
हे भारत के वीर शहीद 
तुझे प्रणाम! 
तुझे प्रणाम! 



रोको मत!

तोपों को गरजने दो
फड़कती बाँहों को
भारत का नया भूगोल गढ़ने दो
नहीं परवाह परमाणु ज्वाला का
एक बार इसे धधकने दो
शांति का पुकार कर
असंख्य कुर्बानियाँ
हम देते आए
मानवता की रक्षार्थ
संधियों पर हम बढ़ते आए
मानवता भी लज्जित होता
शहीद हेमराज के
शीश काटे जाने से
क्या मिला ?
शांति ध्वज फहराने से
अब भारतीय सेना को
रण शौर्य दिखाने दो
अब वक्त कह रहा
चिग्घाड कर लाहौर पर
बम बरसाने दो
बहुत हुआ मौन
अब शौर्य दिखाने दो
छद्म युद्ध झेल रही सेना को
खुले रणक्षेत्र में जाने दो
आतंक की काली काया में
अब आग लगाने दो
रोको मत
फौलादी बाँहों को
राष्ट्र को एक अवसर हैं
खूनी कलंक मिटाने दो
रोको मत!

रविवार, 8 मई 2016

A poem in Hindi.

               खुद्दारी  



मुझे  खुद्दारी   का  मोल  चुकाना  होता हैं ,
अपनों  की  मुस्कान  को  दाँव  लगा  ना  होता  हैं  ।
बाजार  में  बिकते  रिश्तों  को,
 हर  बार  बचाना  होता  हैं  ।
खून  के  रिश्तों  में,
 पड़े  न   दरार  ,
उसे  खुद्दार  हाथों  से  सहलाना  होता  हैं  ।
खुद्दारी  को  बाजारू  गद्दारी  से ,
 हर  बार  टकराना  होता  हैं  ।
खाया  नमक  जो  बाजार  का ,
 उसका  भी  कर्ज  भुगतना  होता  हैं  ।
खुद्दारी  का  वास्ता  देकर  ,
अपनों  से  आँखे  छिपाना  होता  हैं ।
 मुनाफे  के  बाजार  में ,
 खामियाजा  उठाना  होता  हैं  ।
 बिछे  बारूदी  सुरंग  पर ,
 बच  कर  आना  जाना  होता  हैं ।
 खूंखार  जमाना  में  भी ,
 कोई  पुष्प  सा  दीवाना  होता  हैं ।
 खफा  लोगों  को ,
बार -बार  मनाना  होता  हैं  ।

मंगलवार, 3 मई 2016

दो कविताएँ

अठखेलियाँ

विश्व भूख भय और युद्ध से मुक्त हो ,
जीवन की राहों से शोक लुप्त हो ।
मानव करे खुशी से अठखेलियाँ ,
विश्व में न मनाई जाए खूनी होलियाँ।
वह विकास नहीं जो प्रहारक हो ,
हो वही जो शोक निवारक हो।
शासक वही हो ,जो त्यागी हो ,
जन-जन के सुख का अभिलाषी हो।
नृप नृघ्न , मानवता त्यागी ,
क्या होगा वह सत्य का भागी ?
मतों से न विश्व बँटे ,
भाई भाई नफरत की लकीर खींच न हटे।
हर जीव के बीच प्यार का अटूट बंधन हो   ,
 विश्वास का इतना मजबूत पकड़ हो ।
तब क्या प्रहारक अस्त्र-शस्त्र होंगे ,
न उद्विग्न राष्ट्राध्यक्ष होंगे।
 तब शोध से परोपकार का बोध होगा ,
मानवता की राह में, न अवरोध होगा ।
अर्थोंपार्जन जीवन में नूतन बदलाव 
क्या लाएगा?
 आनंद का चरम सुख ,
शांति को मानव क्या पायेगा?
 धनाथॆ, स्वार्थ प्रलय होगा,
 वसुधा विध्वंसित  होगी ।
रोक न सकेगी कोई शक्ति भी उस दिन ,
शक्तियां कलंकित होगी।
 धनसंचय धनस्पृहा त्याग नर आगे आओ ।
ओ धनवालों प्रलय हुंकार रहा सावधान हो जाओ।

खुशहाली का गान

हाथों को जब न काम मिलेगा  ।
किये काम का जब, 
न दाम मिलेगा। 
खाली जेब बाजारवाद के मेले में,
क्या महत्त्व अपमान के जहरीले 
सागर के बीच,
जीवन को खेने में ।
निकम्मे हाथ  कब तक खाली रहेंगे ? 
विवश हो बंदूक  उठाएँगे ।
तब चोर नहीं न्याय  के सिपाही होंगे ।
अन्यायी कहे जाने वाले ही न्यायी होंगे ।
व्यक्ति व्यक्ति अवैध कारोबारी होंगे , 
जब सत्ताधारी ही भष्ट्रता के व्यापारियों होगे ।
 औरतें कमाएंगी बदन दिखा कर ,
नंगी होंगी अपने बच्चों की आँख बचाकर ।
पुरुष शराब बनाएंगे ,
नौजवान शराब के नशे में ,
लुटेरों की तिजोरियां तोड़ने 
आगे बढ़ जाएंगे ।
किसान खेतों में गांजा और कोका उपजाएगे, 
रोटी के जगह डबल रोटी खाएंगे ।
स्कूलों में पढ़ाया जाएगा ,
आग लगाना
बुद्धिजीवियों के मन का लाश जलाना।
 तब भगवान भाग खड़े होंगे, 
इंटरनेट से उनके चरणों पर पुष्प चढ़े होंगे ।
मच्छर विलुप्त होगे भ्रष्टाचार के प्रदूषण से ,
मानव बलवान होगा, दुराचार के पोषण से ।
आह ! तब कैसा दृश्य होगा ।
इसका अलग से ना कोई फी होगा।
 न हिंदुस्तान होगा,
 न होगी हिंदी।
 राष्ट्र में होगी हिंदीभाषियों की बंदी ।
इंडिया का क्या सचमुच रंग होगा।
 इंग्लिश का आया वसंत होगा।
 राजनीतिज्ञ गाएंगे खुशहाली का गान ।
फूलों की वर्षा बरसाएंगे ,
स्वर्गवासी नेता महान ।