धरती घेरे ,
जल घेरे ,
खड़ी कर ली दीवार
अब तो
नील गगन घेरने को तैयार।
जिससे न हो
विषैली हवाएँ आरपार ।
तिनकों के घोसले में
डिप्रेश हो बैठी चिड़िया
अब तो उसके लिए
न दिल्ली रहा न रहा पंजाब
मिट्टी दूषित
जल दूषित
दूषित कर ली आकाश
गिन रहे हैं हम अब
अपनी सांसे।
अब हवा का हो व्यापार।
खेतों में जब कूके कोयल,
बांछे खिल जाती हैं।
किसानों के कानों में
मधुर गाने गुनगुनाती हैं।
दिल्ली में जब कूकती कोयल,
ध्वनि प्रदूषण बढ़ जाती हैं।
महामहिम के बंगलों पर
पिंजरे में वो गाती हैं।
मैली होती दुनिया देख कर
सत्ता पक्ष ढूंढ रहे,
दूसरे ग्रहों पर संसार।
कोयल के कूकने से,
बाधित हैं सरकारी कार्य ।
दिल्ली पुलिस तैयार बैठी हैं ,
बिना वारंट के ही
कर लेगी कोयल को गिरफ्तार।
चाक-चौबंद हैं
सुरक्षा के इंतजाम।