खुद्दारी
मुझे खुद्दारी का मोल चुकाना होता हैं ,
अपनों की मुस्कान को दाँव लगा ना होता हैं ।
बाजार में बिकते रिश्तों को,
हर बार बचाना होता हैं ।
खून के रिश्तों में,
पड़े न दरार ,
उसे खुद्दार हाथों से सहलाना होता हैं ।
खुद्दारी को बाजारू गद्दारी से ,
हर बार टकराना होता हैं ।
खाया नमक जो बाजार का ,
उसका भी कर्ज भुगतना होता हैं ।
खुद्दारी का वास्ता देकर ,
अपनों से आँखे छिपाना होता हैं ।
मुनाफे के बाजार में ,
खामियाजा उठाना होता हैं ।
बिछे बारूदी सुरंग पर ,
बच कर आना जाना होता हैं ।
खूंखार जमाना में भी ,
कोई पुष्प सा दीवाना होता हैं ।
खफा लोगों को ,
बार -बार मनाना होता हैं ।